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sadhu mera pita
मेरी माँ बहुत धार्मिक विचारो की थी. गाँव से बाहर एक पुराना शिव मन्दिर था. वो लगभग हर रोज़ वहा जाती थी. मन्दिर में एक नागा साधू रहता था. वो हर मौसम में भबूत लगाये रहता और लंगोट ही पहनता था. उसके साथ एक साध्वी भी रहती थी. साधू कोई ५० बरस का था और साध्वी शायद ४५ साल की होगी. मेरी माँ की उमर तब 38 साल की थी और में उनका इकलौता बेटा था, मेरी उम्र कोई २1 साल थी. कई बार मै भी माँ के साथ वहा जाता था. साधू कई दफे बिल्कुल नंगा ही मिलता था और तालाब में भी नंगा ही नहा लेता था. साध्वी लुंगी पहनती थी और उपर कुरता जिस पर सर्दी में shawl लपेट लेती थी. माँ मदिर में अकेले जाती थी लेकिन वहा गाँव की दूसरी कई औरते भी जाती थी. आदमी वहा बहुत कम नज़र आते थे. गाँव के लोग उस साधू को नागा बाबा कहते थे. में कई बार माँ से पूछता माँ तुम वहा क्यों जाती हो तो वे या तो हस देती या फ़िर कहती बेटा उनका आशीर्वाद कीमती होता है. मेरे पिताजी की उम्र कोई ४२ साल थी और वे माँ के वहा आने जाने पर कुछ नही बोलते थे, पापा माँ उस मदिर में उस नंगे साधू के पास क्यों जाती है?' एक दिन मैंने पूछा तो पिताजी बोले,' बेटा तू भी उन्ही के आशीर्वाद से हुआ है.'
उस मदिर में शिवरात्रि को कई लोग आते थे, हर शिवरात्रि से पहले माँ कोई १० दिन पहले ही वहा तय्यारियो के लिए चली जाती और शिवरात्रि के हफ्ते दस दिन बाद ही वापस लौटती. एक बार शिवरात्रि से पहले माँ जैसे ही वहा जाने को हुई मैंने कहा माँ में भी चलूँगा तो माँ बोली,' बेटा तेरा वहा मन नही लगेगा तू गाँव में ही खेल,' मगर मैंने जिद पकड़ ली तो माँ बोली,' ठीक है मगर सिर्फ़ दो दिन वहा रुकना और सोमवार की सुबह आ जाना ताकि स्कूल जा सके.' मै भी उनके साथ चल दिया. हम मन्दिर शाम को पहुचे आरती तो साध्वी ने ही की. मन्दिर के उपर ही पहाड़ पर २-३ कमरे बने हुए थे और वही साधू की गुफा भी थी, माँ की तरह वहा २-३ औरते और भी थी जो खाना बनती थी और सफाई वगेरह के काम करती थी. खाना खाने के बाद माँ साधू की गुफा में जाने लगी,' नागा बाबा का भोजन आज मै ले जाउंगी, उसने कहा. में भी साथ जाने की जिद करने लगा माँ ने मना किया तो मै रोने लगा दूसरी औरतो ने कहा, ले जाओ सरिता बच्चा ही तो है, आखिर माँ को मुझे ले जाना पड़ा. अन्दर गुफा में गए तो साधू हुक्का पी रहा था, आ जा सरिता आ जा, क्या ले आई?' उसने पूछा, 'कुछ नही स्वामी आपका भोजन लाई हू,' कह कर माँ ने उसके सामने भोजन की थाली परोसी,' अभी रुक अभी थोड़ा सोमरस पी ले फ़िर भोजन करेंगे, साधू बोला. उसके हाथ में एक ग्लास था जिससे वो कुछ पी रहा था, ' तू पीयेगी?' उसने माँ से पूछा, माँ शर्मा गई, 'अछा बेटा साथ है इसलिए? कह कर साधू हसने लगा. Last edited by user12148 : 19th August 2009 at 11:33 PM. Reason: corrections |
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#2
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#4
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साधू उकडू बैठा था और उस वक्त तो उसने लंगोट पहन रखी थी. " जा इस बच्चे को सुला दे और खाना भी ले जा बाद में गरम कर के ले आना,' वो बोला. मै ये सुनते ही रोने लगा,' में माँ के साथ ही सोऊंगा,' माँ परेशां तो थी मगर बोली,' बच्चा है ५-१० मिनट मै सो जाएगा, ' अछा तो इसको यही सुला दे साधू ने कहा. ' ले चल यहाँ सो जा मै भी तेरे साथ ही सो उंगी ,' माँ ने कहा और साधू की गुफा मै पड़े एक गद्दे पैर मुझे लिटा दिया,' मुझे नीद तो नही आ रही थी मगर मुझे लगा सोने की एक्टिंग करू तो ही बेहतर है.
कोई २-४ मिनट बाद माँ को लगा की मै सो गया हु तो वे साधू से सट कर बैठ गई. साधू के प्याले से वे भी बीच बीच में घूंट लेने लगी. साधू उपर बैठा था, माँ निचे बैठी थी. माँ का मुह ठीक उसकी लंगोट के सामने था. साधू अब माँ के स्तन उनके blouse के उपर से ही दबा रहा था. मेरी माँ अछी थी, कोई ५ फीट २ इंच ऊँची थी, गोरा रंग था. उनके स्तन मोटे और भरे भरे थे, निप्पल्स गुलाबी रंग के थे और ज़्यादा बड़े नही थे. वे काख के बाल कभी साफ़ नही करती थी. उन्होंने उस वक्त आसमानी रंग का blouse पहना हुआ था. साधू अब उनके स्तन आटे की तरह मसल रहा था. कोई २ मिनट बाद उसने माँ का blouse खोल दिया, माँ ने ब्रा नही पहनी थी, उनके स्तन को वो बड़ी बेरहमी से दबा रहा था, माँ ऊह्ह ऊऊओह्ह कर रही थी.' ले अब मेरी लंगोट ढीली कर दे, साधू बोला. साधू खड़ा हो गया माँ ने कुशलता से एक मिनट में उसकी लंगोट उतार दी. वो वापस वैसे ही उकडू हो कर बैठ गया. |
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#5
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अब उसका गुप्तांग साफ़ दिखाई दे रहा था. उसका लंड एकदम काला था और नीचे लटका हुआ था. उसके अंडकोष भी काले थे और किसी गधे के अंडकोष की तरह भरी थे और नीचे लटक रहे थे. साधू ने अपने पुरे गुप्तांग की सफाई कर रखी थी, एक भी झांट नही था. मेरी माँ अब पुरी तरह उत्तेजित थी. उसने साधू के गुप्तांग को मसलना शुरू कर दिया, जिस तरह साधू ने माँ के स्तन मसले थे ठीक उसी तरह साधू के लंड को माँ मसल रही थी. अब माँ थोडी उपर हुई और साधू के लंड के आगे का हिस्सा मुह में ले कर चुसना और चाटना शुरू कर दिया, साधू को यह सब बहुत अच्छा लग रहा था, वो अपनी गांड उपर नीचे करने लगा. कोई दो मिनट की चटाई के बाद साधू का सुपाडा मोटा होने लगा था, अब वो किसी आलू के आकार का लगने लगा था, माँ उसके सुपाडे को होटों और दांतों से उपर नीचे कर रही थी. धीरे धीरे साधू पुरा उत्तेजित होने लगा था, उसका लंड विकराल रूप धारण कर चुका था, अब वो कोई १० इंच का हो चुका था और एकदम सीधा खड़ा था मुझे उसके लंड को देख कर किसी गधी के पीछे लगे गधे की याद आ रही थी, माँ ने अब अपने होत उसकी गोलियो पैर रखे और एक एक गोली को मुह में लेकर बारी बारी से चूसने लगी, सरिता तू मेरे अंडकोष को बहुत अच्छी तरह चूसती है, साधू बोला,' हा स्वामी इनकी वजह से ही तो मै माँ बन पाई, ये नही होते तो अनिल ( मेरा नाम) कैसे पैदा होता?' वो बोली और कुतिया की तरह उनको चूसने लगी.
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#7
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#8
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very hot going bhai complete it
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#10
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माँ ने अपना petticoat खोल दिया और सीधी खड़ी हो गई, साधू उनके बूब्स चूस रहा था और पीछे हाथ ला कर माँ के गोल और मोटे चूतड दबा रहा था, माँ के हिप्स बहुत मोटे और गोल थे, साधू उनको बड़ी बेरहमी से दबा रहा था, साधू का खड़ा लंड माँ की दोनों जांघो को चीरता हुआ बाहर आ रखा था, उसका सुपाडा माँ की गांड के बीच से चमक रहा था. माँ अपनी गांड को थोड़ा आगे पीछे कर रही थी इसी बहाने शायद उनकी चूत के होटों और जांघो की चुदाई हो रही थी. अब माँ और साधू एक दूसरे को चूम रहे थे. थोडी देर बाद साधू ने माँ को उपर किया , माँ ने अपने दोनों पाव उसकी कमर पर लपेटे और गांड उसकी गोद में रख दी, साधू ने माँ की विशाल गांड को पकड़ कर ऊँचा किया और अपने मोटे और कड़क लंड का मुह उनकी चूत के मुह पर रख दिया. साधू का लंड अब माँ की चूत को चीर रहा था, उसने माँ की गांड हाथ में पकड़ी हुई थी, माँ अब ऊँची नीची हो कर उसके मोटे लंड को अपनी चूत में एडजस्ट कर रही थी,' स्वामी इसको छोटा कर दो, ये तो चूत फाडू लंड है, ' वो बोली.
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